सत्य तो अपने निर्मल रुप में ही सदा मेरे पास आया है।... मैनें ही उस पर अपने ज्ञान का तुच्छ आवरण चढ़ाने का प्रयत्न किया था।...
ऐसा नहीं था कि मैं यह जानता नहीं था, लेकिन लगता था कि सत्य को थोड़ा आकर्षक होना चाहिए.... और मैनें उस पर अपने प्रयोग किए।...
अपनी सादगी से दूर होने के क्रम में अपने-आप से ही दूर होता चला गया...
और, अंततः भटकते-भटकते थककर बैठा तो पाया कि सत्य अब भी करुणावश मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।
"... धन्य तू और कृतज्ञ मैं.... चाहे किसी भी राह से चलूं, प्रत्येक राह मुझे अंततः तेरे पास ही ले आती है।..."
ऐसा नहीं था कि मैं यह जानता नहीं था, लेकिन लगता था कि सत्य को थोड़ा आकर्षक होना चाहिए.... और मैनें उस पर अपने प्रयोग किए।...
अपनी सादगी से दूर होने के क्रम में अपने-आप से ही दूर होता चला गया...
और, अंततः भटकते-भटकते थककर बैठा तो पाया कि सत्य अब भी करुणावश मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।
"... धन्य तू और कृतज्ञ मैं.... चाहे किसी भी राह से चलूं, प्रत्येक राह मुझे अंततः तेरे पास ही ले आती है।..."