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Thursday, September 11, 2014

सम्भवामि युगे युगे

समय किसी के लिए नहीं रुकता। निरंतर चलते रहना ही उसका धर्म है। और; जो इस सत्य को जान लेता है, वही इसके अनुरूप कार्य करते हुए धर्म की संस्थापना कर सकता है। मानव-सभ्यता का संपूर्ण इतिहास इसी कारणवश अवतारवाद को स्वीकार करने पर विवश हुआ है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए, सबने समय को समझा और अपनी क्षमता को समय की कसौटी पर परखकर देखा है। और; यही कारण है कि संसार उनको देवत्व की श्रेणी में पूजता आया है। 'सम्भवामि युगे युगे' उसी दिशा में एक नए अवतार के निर्माण का विनम्र परंतु सशक्त प्रयत्न है।

नवपाषाण युग का मानव जब सभ्यता और संस्कृति के प्रारंभिक चरण में था, उस समय प्रकृति की अदम्य शक्तियाँ उसके लिए देवतुल्य थीं। परिणामस्वरुप, ऋग्वैदिक काल तक आते-आते अग्नि, वायु, वरुण जैसे प्राकृतिक संकेत देवता बन गए। उस समाज में जो राजा और रक्षक था, वह इन्द्र तथा विष्णु के रुप में पूजा जाने लगा। सैंधव समाज का 'पशुपति' आर्यों का 'रूद्र' कहलाने लगा और 'मातृदेवी' अब 'शक्ति' के रुप में पूजनीय हो गयीं। कितनी सहजता से समय स्वयं ही अपने देवताओं की रचना कर रहा था।

समय ने पुनः नयी करवट ली और आर्य सभ्यता में 'श्रीराम' का आगमन हुआ। अपने वर्तमान समाज को संगठित कर उन्होनें तामसिक ताकतों का नाश किया और जन जन में लोकप्रिय हो गए। लोकप्रिय इतने कि अंततः वह विष्णु का अवतार माने जाने लगें। (विष्णु ने भी तो अपने युग में सबको संगठित और संरक्षित ही किया था।) तत्पश्चात्, जिस श्रीकृष्ण ने 'सम्भवामि युगे युगे' का शंखनाद किया था, समय के रंगमंच पर उनका प्राकट्य हुआ।

यदि अवतारवाद की परिकल्पना को परिपूर्णता प्रदान करनी हो, तो हमारे पास 'श्रीकृष्ण' श्रेष्ठतम विकल्प हैं। वह कारागार में जन्म लेता है, ग्वालों - चरवाहों के बीच पलकर बड़ा होता है, वंशी बजाता है, रास रचाता है और एक दिन अचानक उसे ज्ञात होता है कि उसका वास्तविक परिचय तो कुछ और ही है। तत्पश्चात्, वही आगे बढ़कर अत्याचारी कंस का विनाश करता है, जरासंध की सत्ता को चुनौती देता है, नयी नगरी का निर्माण करता है, धर्म पर चलने वाले पांडवों का संरक्षक बनकर इंद्रप्रस्थ की स्थापना करता है, अन्याय और अधर्म के प्रतिकार हेतु महाभारत युद्ध का आयोजन करने से भी नहीं हिचकता, और अंततः 'श्रीमद्भगवद्गीता' के रुप में समस्त मानव जाति को 'कर्मयोग' का पाठ पढ़ा जाता है।

निश्चय ही ईश्वर अवतार नहीं लेता, बल्कि मनुष्य का ही उत्थान देवत्व की ओर होता है। गौतम बुद्ध, महावीर, चाणक्य, सम्राट अशोक, विक्रमादित्य, ईसामसीह, पैगम्बर मुहम्मद, गुरुनानक देव, सम्राट अकबर, वीर शिवाजी, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने समय की धारा के अनुकूल आचरण करते हुए ही युगपुरुष की उपाधि प्राप्त की है। यह आलेख वास्तव में शंखनाद हैः-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।

Monday, September 1, 2014

चेतावनी

उसका सूप उसके हाथ में है, 
और वह अपना खलिहान अच्छी रीति से साफ करेगा!

वह गेहूँ को तो खेत में इकठ्ठा करेगा, 

और भूसी को उस आग में डाल देगा जो बुझने वाली नहीं है!!!

Sunday, August 31, 2014

अनासक्त

सारे रिश्ते हमें ईश्वर की ओर से उनकी अमानत के रुप में प्राप्त होते हैं। अमानत की रक्षा की जाती है, सेवा की जाती है। उन्हें अपना समझने की भूल ही हमें मोह में डालती है।

श्रीकृष्ण इसीलिए हमें अनासक्त कर्म की राह दिखाते हैं- कर्म केवल कर्म के लिए।

Saturday, August 30, 2014

योद्धा किसी भी स्थान पर रहे, योद्धा ही रहता है।

पराजय और पतन का दौर जब भी जीवन में आता है, सब कुछ निरर्थक लगने लगता है- विचार, प्रयत्न, संबंध और जीवन भी। 

परंतु, जो ऋतु के नियमों से अवगत हैं, वह जानते हैं कि पतन एक अनिवार्य प्रक्रिया है। इस पतनकाल में ही पुनरुत्थान के बीज बोए जाते हैं, शक्ति-संचय हेतु विश्राम किया जाता है और नए युग के स्वागत हेतु तैयारियाँ की जाती है।

जीवन-संघर्ष मैराथन दौड़ की तरह है, कभी स्वयं को पीछे पाकर हताश न हों........ केवल कायर ही पराजित होने को अभिशप्त हैं। 

योद्धा किसी भी स्थान पर रहे, योद्धा ही रहता है।

Wednesday, August 27, 2014

सत्य असीम और अनन्त है।

सृष्टि केवल तुम्हारी दृष्टि तक ही सीमित नहीं है! 
तुम कहते हो कि जो दिखता है, वही सत्य है।... 
हाँ, वह सत्य तो है, परंतु सीमित है।

कुएं का मेढक अपने कुएं को ही संसार मानता है, परंतु संसार वहीं समाप्त नहीं होता। 

अपने संकुचित संसार से बाहर आकर देखो... 
सत्य असीम और अनन्त है।

Tuesday, August 26, 2014

अमृत-मंथन

अंतर्मन में विचारों का मंथन चलता रहता है।
अधिकांश हलाहल, थोड़ा सा अमृत मिलता है।।

मन, वाणी और व्यवहार की समता तो संभव ही नहीं।
जो चाहता इंसान, वह हर बार हो सकता नहीं।।

इसलिए मानव बुद्धि को यह निर्णय लेना पड़ता है।
अपने विष को पीकर, जग को अमृत देना पड़ता है।।

Monday, August 25, 2014

प्रार्थना

मेरे हृदय में जाग्रत होकर, मेरा मान बढ़ा दे तू!
मैं तेरी धुन पर गाऊँ, इतना सम्मान दिला दे तू!!

जब रात घनी अंधेरी हो, तेरी लोरी सुन सो जाऊँ!
जब प्रातः अरुणोदय हो, तेरी भक्ति में खो जाऊँ!!

हर दुख में तू साथ रहे, मेरा कष्ट मिटाने को!
हर सुख में तू पास रहे, मुझमें प्रेम जगाने को!!

जो कुछ थोड़ा बाकी है, वह अभिमान गला दे तू!

मेरे हृदय में जाग्रत होकर, मेरा मान बढ़ा दे तू!!

Sunday, August 24, 2014

सत्य

कोई भी किसी को धोखा नहीं देता। आदमी अपनी काल्पनिक अपेक्षाओं के कारण धोखा खाता है, अंधविश्वास के कारण धोखा खाता है।

लोग अपनी ही आँखों पर हथेली रख लेते हैं और कहते हैं कि अंधेरा छा गया है।

सत्य की रोटी का स्वाद भले ही फीका लगे, लेकिन काल्पनिक परांठों से पेट नहीं भरता।

Saturday, August 23, 2014

साहस

समय किसी के लिए नहीं रुकता। निरंतर चलते रहना ही इसका धर्म है..... और जो इसकी अवहेलना कर सुखद भविष्य की कल्पना करता है, उसका भविष्य तो अनिश्चित है ही, वर्तमान भी नारकीय हो जाता है।

केवल एक ही कुसंस्कार है- कायरता! यदि हम घुटनों पर सिर टेककर रोते रहें और देवताओं के अवतार की प्रतीक्षा करें तो उससे क्या होगा??

भारत की जनता 36 करोड़ देवी-देवताओं के समक्ष रोती है और फिर भी नारकीय जिंदगी जीने पर विवश है..... ये देवता हैं कहाँ?

अवतार की बात करना छोड़ो, मनुष्य के उत्थान का प्रयत्न करो। अपनी लड़ाई हमें स्वयं ही लड़नी है, डरो मत। साहसी बनो, मौत तो कायरों को आती है...........

साहसी के लिए यह जीवन स्वर्ग है और जीवन के पश्चात् इतिहास में यश।

Thursday, August 21, 2014

सार-सार को ग्रहण किया, थोथा दिया उड़ाय।

जब आप सोने की तलाश में खदान की मिट्टी खोदते हैं तो आपका ध्यान किस पर रहता है?

खेत में फसल उगती है, उसमें ढेर सारा रद्दी भूसा भी होता है तो आप क्या खाते है?

क्या इसलिए सारे ग्रंथों को कूड़ेदान में डाल दिया जाए कि उनसे अंधविश्वास भी फैलता है?

तब तो घर की बिजली भी काट दीजिए, क्योंकि उससे करंट भी लग सकता है।

सभी मोटरगाड़ियों को बंद कर दीजिए, क्योंकि उसके तले आकर कोई मर भी सकता है।

महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता की आलोचना करने से पहले क्या आपने उसे पढ़कर देखा है?

या केवल धूर्त पंडितों की सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ही आप आलोचना करते हैं?

वेदव्यास ने 8,800 श्लोकों में जय-संहिता लिखी थी, जिसमें कौरव-पांडवों के संघर्ष का वर्णन है।

इसका विस्तार उनके शिष्यों ने किया, और आज जो महाभारत हमें उपलब्ध है, उसमें कई कथाएं जोड़ी गयी हैं।

कथाएं हैं तो कल्पना भी रहेगी हीं। क्या आप फिल्म देखते हैं तो सब कुछ सच मान लेते हैं?

अध्ययन का एक नियम है- 'सार-सार को ग्रहण किया, थोथा दिया उड़ाय।' केवल प्रासंगिक और जीवंत बातों को ग्रहण करें, निरर्थक बातों को महत्व देना वैसा ही है, जैसे मरने के बाद भी लाश को ढोते रहना।

Wednesday, August 20, 2014

स्वीकार

हम अपने जीवन में प्रायः दो तरह के लोगों से मिलते हैं। एक तो वह, जो संसार में आसक्त है, भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न कार्यों में लगा रहता है। और दूसरा वह, जो संसार से विरक्त होना चाह रहा है, भागने का प्रयत्न कर रहा है।

संसार में आसक्ति साधारण सी बात है, अधिकांश लोग आसक्त हैं। इसलिए यदि कोई संसार से विरक्त होता दिखायी देता है, सांसारिक सुखों का त्याग करता दिखायी देता है तो हम स्वतः उसे असाधारण मान लेते हैं। हमें लगता है कि वह कितना अद्भुत व्यक्ति है जो संसार का मोह त्याग चुका है और एक हम हैं कि हमसे यह संसार, यह मोह छूटता ही नहीं।

असाधारण, असामान्य, अस्वाभाविक के लिए उत्सुकता मानव-मन का स्वभाव है। आकर्षण प्रायः विपरीत चीजों के प्रति ही होता है। इसलिए संसार से भागने की कल्पना आकर्षित करती है।

असाधारण बनने की चाह हम सबमें होती है। दूसरों को प्रभावित कर हम वस्तुतः अपने ही अहम् को संतुष्टि प्रदान करते हैं। और, असाधारण दिखने के लिए हम वह सब करने लगते हैं जो स्वाभाविक नहीं होता। असाधारण दिखने की इसी वासना ने तथाकथित संत-महात्माओं, साधु-सन्यासियों की विशालकाय फ़ौज खड़ी कर दी। और जो यह साहस न कर सके, वह उनके भक्त बनकर रह गए।

परंतु, प्रकृति स्वाभाविक है। यह अस्वाभाविकता का प्रतिकार करती है। जैसे ही हम प्रकृति के विरुद्ध आचरण करते हैं, हमारा मन विचलित होने लगता है। हम जिस चीज से भागने की कोशिश करते हैं, हमारा मन सर्वाधिक उसी ओर भटकता है। संसार का कथित रुप से त्याग करने वाले संत-महात्मा, साधु-सन्यासी इसी विचलन का शिकार हो जाते हैं।

क्यों कोई साधु अपने साथ शिष्यों का जमावड़ा लेकर चलता है? क्यों कोई सन्यासी अपने जीवन-यापन के लिए किसी सांसारिक व्यक्ति की भिक्षा पर निर्भर रहता है? क्यों कोई संत अपने पंथ को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयत्न करता है और क्यों कोई महात्मा दूसरों से अपनी पूजा स्वीकार कर पाता है?

प्रकृति में जो भी स्वाभाविक है, वह सत्य है और उससे भागने का प्रयत्न वस्तुतः सत्य का विरोध ही है। भोजन की वासना सर्वाधिक तभी होती है, जब हम उपवास में रहते हैं। किसी की याद तभी सर्वाधिक आती है, जब हम उसके पास जाने में समर्थ नहीं होते। पुनः हम जिस चीज से भागने की कोशिश करते हैं, हमारा मन सर्वाधिक उसी ओर भटकता है।

विचारणीय है कि वर्तमान में यदि तथाकथित संत-महात्माओं, साधु-सन्यासियों पर एक के बाद एक आरोप लग रहे हैं तो इसमें दोष किसका है?

हमें केवल यही एक जीवन मिला है और यदि यह जीवन, यह संसार ईश्वर की देन है तो इससे भागकर क्या हम ईश्वर की अवहेलना नहीं कर रहें? संसार में रहकर ही हम अपने कर्तव्यों की पूर्ति कर सकते हैं, अपने जीवन को श्रेष्ठतम आयाम प्रदान कर सकते हैं। 

आसक्ति से मोह उत्पन्न होता है और विरक्ति के प्रयत्न से वासना कुंठित होती है। जो जैसा है उसे उसी रुप में स्वीकार करना होगा। सत्य के मार्ग में संसार का स्वीकार ही एकमात्र विकल्प है।

Tuesday, August 19, 2014

आत्म-समर्पण

सत्य तो अपने निर्मल रुप में ही सदा मेरे पास आया है।... मैनें ही उस पर अपने ज्ञान का तुच्छ आवरण चढ़ाने का प्रयत्न किया था।...

ऐसा नहीं था कि मैं यह जानता नहीं था, लेकिन लगता था कि सत्य को थोड़ा आकर्षक होना चाहिए.... और मैनें उस पर अपने प्रयोग किए।...

अपनी सादगी से दूर होने के क्रम में अपने-आप से ही दूर होता चला गया... 

और, अंततः भटकते-भटकते थककर बैठा तो पाया कि सत्य अब भी करुणावश मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।

"... धन्य तू और कृतज्ञ मैं.... चाहे किसी भी राह से चलूं, प्रत्येक राह मुझे अंततः तेरे पास ही ले आती है।..."

Monday, August 18, 2014

प्रस्तावना

मेरा यह  'ब्लॉग' वस्तुतः मेरी संघर्ष-यात्रा  है। सत्य की राह आसान भले ही न हो, परंतु सहज है, सरल है।

सत्य का मार्ग काँटों से भरा दिखाई देता है, परंतु ये काँटे आरंभ में केवल सुपात्र की योग्यता का परीक्षण करते हैं। मैं भी इनसे डरकर दूसरे विकल्प तलाश करता रहा था, परंतु भागकर कहाँ जाता?

झूठ बोलना जितना आसान लगता है, उतना ही कठिन है उसके साथ जीवन जी पाना। कागज के नाव बरसात के पानी में तो तैर लेते हैं, पर उनसे नदी कहाँ पार होती है? रेत के घरौंदे बच्चों के खेल तक ही सीमित रहने चाहिए, उनमें आशियाना नहीं बनाया जा सकता।

भटकने का भी अपना एक सुख है। हम प्रायः अपनी बनायी हुई काल्पनिक दुनिया में भटकते रहते हैं। और, त्रासदी यह कि अपनी ये विरासत हम आने वाली पीढ़ियों को भी दे जाते हैं।

धार्मिक ग्रंथों और धर्मस्थलों ने हमें धार्मिक बनाया हो या नहीं, परंतु ईश्वरीय अनुभूतियों से वंचित अवश्य किए रखा। क्या मेरे भोजन करने से किसी और का पेट भर सकता है? यदि नहीं, तो किसी और के दर्शन से हम सत्य को कैसे जान सकते हैं?


जो भी सत्य के अन्वेषण में आगे बढ़ेगा, उसे अपना मार्ग स्वयं ही बनाना होगा। अन्य कोई विकल्प नहीं, हमें अपनी यात्रा स्वयं ही तय करनी होगी, अपने मार्ग स्वयं ही निर्मित करने पड़ेंगे।