समय किसी के लिए नहीं रुकता। निरंतर चलते रहना ही इसका धर्म है..... और जो इसकी अवहेलना कर सुखद भविष्य की कल्पना करता है, उसका भविष्य तो अनिश्चित है ही, वर्तमान भी नारकीय हो जाता है।
केवल एक ही कुसंस्कार है- कायरता! यदि हम घुटनों पर सिर टेककर रोते रहें और देवताओं के अवतार की प्रतीक्षा करें तो उससे क्या होगा??
भारत की जनता 36 करोड़ देवी-देवताओं के समक्ष रोती है और फिर भी नारकीय जिंदगी जीने पर विवश है..... ये देवता हैं कहाँ?
अवतार की बात करना छोड़ो, मनुष्य के उत्थान का प्रयत्न करो। अपनी लड़ाई हमें स्वयं ही लड़नी है, डरो मत। साहसी बनो, मौत तो कायरों को आती है...........
साहसी के लिए यह जीवन स्वर्ग है और जीवन के पश्चात् इतिहास में यश।
केवल एक ही कुसंस्कार है- कायरता! यदि हम घुटनों पर सिर टेककर रोते रहें और देवताओं के अवतार की प्रतीक्षा करें तो उससे क्या होगा??
भारत की जनता 36 करोड़ देवी-देवताओं के समक्ष रोती है और फिर भी नारकीय जिंदगी जीने पर विवश है..... ये देवता हैं कहाँ?
अवतार की बात करना छोड़ो, मनुष्य के उत्थान का प्रयत्न करो। अपनी लड़ाई हमें स्वयं ही लड़नी है, डरो मत। साहसी बनो, मौत तो कायरों को आती है...........
साहसी के लिए यह जीवन स्वर्ग है और जीवन के पश्चात् इतिहास में यश।
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