जब आप सोने की तलाश में खदान की मिट्टी खोदते हैं तो आपका ध्यान किस पर रहता है?
खेत में फसल उगती है, उसमें ढेर सारा रद्दी भूसा भी होता है तो आप क्या खाते है?
क्या इसलिए सारे ग्रंथों को कूड़ेदान में डाल दिया जाए कि उनसे अंधविश्वास भी फैलता है?
तब तो घर की बिजली भी काट दीजिए, क्योंकि उससे करंट भी लग सकता है।
सभी मोटरगाड़ियों को बंद कर दीजिए, क्योंकि उसके तले आकर कोई मर भी सकता है।
महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता की आलोचना करने से पहले क्या आपने उसे पढ़कर देखा है?
या केवल धूर्त पंडितों की सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ही आप आलोचना करते हैं?
वेदव्यास ने 8,800 श्लोकों में जय-संहिता लिखी थी, जिसमें कौरव-पांडवों के संघर्ष का वर्णन है।
इसका विस्तार उनके शिष्यों ने किया, और आज जो महाभारत हमें उपलब्ध है, उसमें कई कथाएं जोड़ी गयी हैं।
कथाएं हैं तो कल्पना भी रहेगी हीं। क्या आप फिल्म देखते हैं तो सब कुछ सच मान लेते हैं?
अध्ययन का एक नियम है- 'सार-सार को ग्रहण किया, थोथा दिया उड़ाय।' केवल प्रासंगिक और जीवंत बातों को ग्रहण करें, निरर्थक बातों को महत्व देना वैसा ही है, जैसे मरने के बाद भी लाश को ढोते रहना।
खेत में फसल उगती है, उसमें ढेर सारा रद्दी भूसा भी होता है तो आप क्या खाते है?
क्या इसलिए सारे ग्रंथों को कूड़ेदान में डाल दिया जाए कि उनसे अंधविश्वास भी फैलता है?
तब तो घर की बिजली भी काट दीजिए, क्योंकि उससे करंट भी लग सकता है।
सभी मोटरगाड़ियों को बंद कर दीजिए, क्योंकि उसके तले आकर कोई मर भी सकता है।
महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता की आलोचना करने से पहले क्या आपने उसे पढ़कर देखा है?
या केवल धूर्त पंडितों की सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ही आप आलोचना करते हैं?
वेदव्यास ने 8,800 श्लोकों में जय-संहिता लिखी थी, जिसमें कौरव-पांडवों के संघर्ष का वर्णन है।
इसका विस्तार उनके शिष्यों ने किया, और आज जो महाभारत हमें उपलब्ध है, उसमें कई कथाएं जोड़ी गयी हैं।
कथाएं हैं तो कल्पना भी रहेगी हीं। क्या आप फिल्म देखते हैं तो सब कुछ सच मान लेते हैं?
अध्ययन का एक नियम है- 'सार-सार को ग्रहण किया, थोथा दिया उड़ाय।' केवल प्रासंगिक और जीवंत बातों को ग्रहण करें, निरर्थक बातों को महत्व देना वैसा ही है, जैसे मरने के बाद भी लाश को ढोते रहना।
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