अंतर्मन में विचारों का मंथन चलता रहता है।
अधिकांश हलाहल, थोड़ा सा अमृत मिलता है।।
मन, वाणी और व्यवहार की समता तो संभव ही नहीं।
जो चाहता इंसान, वह हर बार हो सकता नहीं।।
इसलिए मानव बुद्धि को यह निर्णय लेना पड़ता है।
अपने विष को पीकर, जग को अमृत देना पड़ता है।।
अधिकांश हलाहल, थोड़ा सा अमृत मिलता है।।
मन, वाणी और व्यवहार की समता तो संभव ही नहीं।
जो चाहता इंसान, वह हर बार हो सकता नहीं।।
इसलिए मानव बुद्धि को यह निर्णय लेना पड़ता है।
अपने विष को पीकर, जग को अमृत देना पड़ता है।।