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Wednesday, August 20, 2014

स्वीकार

हम अपने जीवन में प्रायः दो तरह के लोगों से मिलते हैं। एक तो वह, जो संसार में आसक्त है, भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न कार्यों में लगा रहता है। और दूसरा वह, जो संसार से विरक्त होना चाह रहा है, भागने का प्रयत्न कर रहा है।

संसार में आसक्ति साधारण सी बात है, अधिकांश लोग आसक्त हैं। इसलिए यदि कोई संसार से विरक्त होता दिखायी देता है, सांसारिक सुखों का त्याग करता दिखायी देता है तो हम स्वतः उसे असाधारण मान लेते हैं। हमें लगता है कि वह कितना अद्भुत व्यक्ति है जो संसार का मोह त्याग चुका है और एक हम हैं कि हमसे यह संसार, यह मोह छूटता ही नहीं।

असाधारण, असामान्य, अस्वाभाविक के लिए उत्सुकता मानव-मन का स्वभाव है। आकर्षण प्रायः विपरीत चीजों के प्रति ही होता है। इसलिए संसार से भागने की कल्पना आकर्षित करती है।

असाधारण बनने की चाह हम सबमें होती है। दूसरों को प्रभावित कर हम वस्तुतः अपने ही अहम् को संतुष्टि प्रदान करते हैं। और, असाधारण दिखने के लिए हम वह सब करने लगते हैं जो स्वाभाविक नहीं होता। असाधारण दिखने की इसी वासना ने तथाकथित संत-महात्माओं, साधु-सन्यासियों की विशालकाय फ़ौज खड़ी कर दी। और जो यह साहस न कर सके, वह उनके भक्त बनकर रह गए।

परंतु, प्रकृति स्वाभाविक है। यह अस्वाभाविकता का प्रतिकार करती है। जैसे ही हम प्रकृति के विरुद्ध आचरण करते हैं, हमारा मन विचलित होने लगता है। हम जिस चीज से भागने की कोशिश करते हैं, हमारा मन सर्वाधिक उसी ओर भटकता है। संसार का कथित रुप से त्याग करने वाले संत-महात्मा, साधु-सन्यासी इसी विचलन का शिकार हो जाते हैं।

क्यों कोई साधु अपने साथ शिष्यों का जमावड़ा लेकर चलता है? क्यों कोई सन्यासी अपने जीवन-यापन के लिए किसी सांसारिक व्यक्ति की भिक्षा पर निर्भर रहता है? क्यों कोई संत अपने पंथ को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयत्न करता है और क्यों कोई महात्मा दूसरों से अपनी पूजा स्वीकार कर पाता है?

प्रकृति में जो भी स्वाभाविक है, वह सत्य है और उससे भागने का प्रयत्न वस्तुतः सत्य का विरोध ही है। भोजन की वासना सर्वाधिक तभी होती है, जब हम उपवास में रहते हैं। किसी की याद तभी सर्वाधिक आती है, जब हम उसके पास जाने में समर्थ नहीं होते। पुनः हम जिस चीज से भागने की कोशिश करते हैं, हमारा मन सर्वाधिक उसी ओर भटकता है।

विचारणीय है कि वर्तमान में यदि तथाकथित संत-महात्माओं, साधु-सन्यासियों पर एक के बाद एक आरोप लग रहे हैं तो इसमें दोष किसका है?

हमें केवल यही एक जीवन मिला है और यदि यह जीवन, यह संसार ईश्वर की देन है तो इससे भागकर क्या हम ईश्वर की अवहेलना नहीं कर रहें? संसार में रहकर ही हम अपने कर्तव्यों की पूर्ति कर सकते हैं, अपने जीवन को श्रेष्ठतम आयाम प्रदान कर सकते हैं। 

आसक्ति से मोह उत्पन्न होता है और विरक्ति के प्रयत्न से वासना कुंठित होती है। जो जैसा है उसे उसी रुप में स्वीकार करना होगा। सत्य के मार्ग में संसार का स्वीकार ही एकमात्र विकल्प है।

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