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Saturday, August 30, 2014

योद्धा किसी भी स्थान पर रहे, योद्धा ही रहता है।

पराजय और पतन का दौर जब भी जीवन में आता है, सब कुछ निरर्थक लगने लगता है- विचार, प्रयत्न, संबंध और जीवन भी। 

परंतु, जो ऋतु के नियमों से अवगत हैं, वह जानते हैं कि पतन एक अनिवार्य प्रक्रिया है। इस पतनकाल में ही पुनरुत्थान के बीज बोए जाते हैं, शक्ति-संचय हेतु विश्राम किया जाता है और नए युग के स्वागत हेतु तैयारियाँ की जाती है।

जीवन-संघर्ष मैराथन दौड़ की तरह है, कभी स्वयं को पीछे पाकर हताश न हों........ केवल कायर ही पराजित होने को अभिशप्त हैं। 

योद्धा किसी भी स्थान पर रहे, योद्धा ही रहता है।

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