समय किसी के लिए नहीं रुकता। निरंतर चलते रहना ही
उसका धर्म है। और; जो इस सत्य को जान लेता है, वही इसके अनुरूप कार्य करते हुए
धर्म की संस्थापना कर सकता है। मानव-सभ्यता का संपूर्ण इतिहास इसी कारणवश अवतारवाद
को स्वीकार करने पर विवश हुआ है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए, सबने समय को
समझा और अपनी क्षमता को समय की कसौटी पर परखकर देखा है। और; यही कारण है कि संसार
उनको देवत्व की श्रेणी में पूजता आया है। 'सम्भवामि युगे युगे' उसी दिशा में एक नए
अवतार के निर्माण का विनम्र परंतु सशक्त प्रयत्न है।
नवपाषाण युग का मानव जब सभ्यता और संस्कृति के
प्रारंभिक चरण में था, उस समय प्रकृति की अदम्य शक्तियाँ उसके लिए देवतुल्य थीं।
परिणामस्वरुप, ऋग्वैदिक काल तक आते-आते अग्नि, वायु, वरुण जैसे प्राकृतिक संकेत
देवता बन गए। उस समाज में जो राजा और रक्षक था, वह इन्द्र तथा विष्णु के रुप में
पूजा जाने लगा। सैंधव समाज का 'पशुपति' आर्यों का 'रूद्र' कहलाने लगा और 'मातृदेवी'
अब 'शक्ति' के रुप में पूजनीय हो गयीं। कितनी सहजता से समय स्वयं ही अपने देवताओं
की रचना कर रहा था।
समय ने पुनः नयी करवट ली और आर्य सभ्यता में 'श्रीराम'
का आगमन हुआ। अपने वर्तमान समाज को संगठित कर उन्होनें तामसिक ताकतों का नाश किया
और जन जन में लोकप्रिय हो गए। लोकप्रिय इतने कि अंततः वह विष्णु का अवतार माने
जाने लगें। (विष्णु ने भी तो अपने युग में सबको संगठित और संरक्षित ही किया था।)
तत्पश्चात्, जिस श्रीकृष्ण ने 'सम्भवामि युगे युगे' का शंखनाद किया था, समय के
रंगमंच पर उनका प्राकट्य हुआ।
यदि अवतारवाद की परिकल्पना को परिपूर्णता प्रदान करनी
हो, तो हमारे पास 'श्रीकृष्ण' श्रेष्ठतम विकल्प हैं। वह कारागार में जन्म लेता है,
ग्वालों - चरवाहों के बीच पलकर बड़ा होता है, वंशी बजाता है, रास रचाता है और एक
दिन अचानक उसे ज्ञात होता है कि उसका वास्तविक परिचय तो कुछ और ही है। तत्पश्चात्,
वही आगे बढ़कर अत्याचारी कंस का विनाश करता है, जरासंध की सत्ता को चुनौती देता
है, नयी नगरी का निर्माण करता है, धर्म पर चलने वाले पांडवों का संरक्षक बनकर
इंद्रप्रस्थ की स्थापना करता है, अन्याय और अधर्म के प्रतिकार हेतु महाभारत युद्ध
का आयोजन करने से भी नहीं हिचकता, और अंततः 'श्रीमद्भगवद्गीता' के रुप में समस्त
मानव जाति को 'कर्मयोग' का पाठ पढ़ा जाता है।
निश्चय ही ईश्वर अवतार नहीं लेता, बल्कि मनुष्य का ही
उत्थान देवत्व की ओर होता है। गौतम बुद्ध, महावीर, चाणक्य, सम्राट अशोक,
विक्रमादित्य, ईसामसीह, पैगम्बर मुहम्मद, गुरुनानक देव, सम्राट अकबर, वीर शिवाजी,
स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने समय की धारा के अनुकूल आचरण
करते हुए ही युगपुरुष की उपाधि प्राप्त की है। यह आलेख वास्तव में शंखनाद हैः-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानं
अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय
साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।
No comments:
Post a Comment