My Followers

Monday, August 18, 2014

प्रस्तावना

मेरा यह  'ब्लॉग' वस्तुतः मेरी संघर्ष-यात्रा  है। सत्य की राह आसान भले ही न हो, परंतु सहज है, सरल है।

सत्य का मार्ग काँटों से भरा दिखाई देता है, परंतु ये काँटे आरंभ में केवल सुपात्र की योग्यता का परीक्षण करते हैं। मैं भी इनसे डरकर दूसरे विकल्प तलाश करता रहा था, परंतु भागकर कहाँ जाता?

झूठ बोलना जितना आसान लगता है, उतना ही कठिन है उसके साथ जीवन जी पाना। कागज के नाव बरसात के पानी में तो तैर लेते हैं, पर उनसे नदी कहाँ पार होती है? रेत के घरौंदे बच्चों के खेल तक ही सीमित रहने चाहिए, उनमें आशियाना नहीं बनाया जा सकता।

भटकने का भी अपना एक सुख है। हम प्रायः अपनी बनायी हुई काल्पनिक दुनिया में भटकते रहते हैं। और, त्रासदी यह कि अपनी ये विरासत हम आने वाली पीढ़ियों को भी दे जाते हैं।

धार्मिक ग्रंथों और धर्मस्थलों ने हमें धार्मिक बनाया हो या नहीं, परंतु ईश्वरीय अनुभूतियों से वंचित अवश्य किए रखा। क्या मेरे भोजन करने से किसी और का पेट भर सकता है? यदि नहीं, तो किसी और के दर्शन से हम सत्य को कैसे जान सकते हैं?


जो भी सत्य के अन्वेषण में आगे बढ़ेगा, उसे अपना मार्ग स्वयं ही बनाना होगा। अन्य कोई विकल्प नहीं, हमें अपनी यात्रा स्वयं ही तय करनी होगी, अपने मार्ग स्वयं ही निर्मित करने पड़ेंगे। 

2 comments:

  1. सत्य हर जगह, हर घड़ी, अपने शाश्वत रुप में उपस्थित रहता है लेकिन हम ही उसकी उपस्थिति महसूस नहीं कर पाते हैं।
    पक्षी के चहचहाने, झरनों की रागिनी, सूर्य की प्रकाश यात्रा एवं प्रकृति के हर हलचल में उसी का हमें सतत् दिग्दर्शन होता रहता है लेकिन हम अभागे हैं जो सत्य के बीच होते हुए भी हम उसे महसूस नहीं कर पाते हैं। उस मछली की तरह जो पानी में होते हुए भी पानी की अहमियत को नहीं समझ पाती।

    ReplyDelete
  2. Sahi kaha aapne, hame apni yatra khud hi puri karni hogi.

    ReplyDelete